बीवी की चुदाई की प्यास – 3

ये देख कर गुरबचन जी हंस कर बोले- पूरी प्रशिक्षित हो गई है रांड … साली कोठे पर बैठने लायक हो गई है। अरुणिमा भी हंस दी। गुरबचन जी ने उसके चूतड़ों को फैलाया और अपना लंड उसके गांड में घुसाने लगे। 

अरुणिमा की पहले भी गांड मरा चुकी थी लेकिन फिर भी वो अभी इतनी अभ्यस्त नहीं हुई थी कि आसानी से गुरबचन जी का लंड अन्दर चला जाए। फिर गांड मारने वाले और मराने वालियां इस बात को समझती होंगी कि गांड में लंड लेने में शुरुआत में दर्द होता ही है। 

जैसे तैसे कराहते चिहुंकते एक दो मिनट में लंड गांड के अन्दर समा गया। उसके बाद गुरबचन जी मेरी बीवी की कमर पकड़ कर उसकी गांड पूरी ताकत से चोदने लगे। 

कुछ झटकों तक अरुणिमा अपने होंठों को चबाती हुई कराहती रही। कुछ देर बाद अपनी आंखें बंद करके उसने चेहरा तकिए पर टिका दिया। गुरबचन जी कुछ मिनट उसकी गांड मारते रहे, फिर रुक कर उसके मम्मों को जोर जोर से मसलने लगे। 

निप्पलों को खींचते और दोबारा से उसकी गांड मारना चालू कर देते। इसी तरह गांड चुदाई करते करते कुछ मिनट में वो उसकी गांड में झड़ गए। फिर उन्होंने अपना लंड बाहर निकाला और बाथरूम में घुस गए।

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बीवी को चोदने के लिए माँगा

दस मिनट बाद बाहर आए और कपड़े पहनने लगे। शमशुद्दीन जी अपने कपड़े पहन कर ड्राइंग रूम में बैठे थे और गुरबचन जी के आते ही खड़े हो गए। गुरबचन जी मुझसे बोले- सोच रहा हूँ कि आज रात अरुणिमा रंडी को घर ले जाऊं, आज रात इसे तबीयत से चोद कर सुबह वापस पहुंचा दूँ। 

मैंने कुछ नहीं कहा, बस अपने दोनों हाथ जोड़ दिए। शमशुद्दीन जी हंस दिए और बोले- भड़वे, हाथ मत जोड़ … सर मजाक कर रहे हैं। फाइल देख ली हो, तो कल निगम जाकर जरूरी दस्तावेज जमा कर देना और काम तुझे आबंटित हो जाएगा। 

भूलना मत, मुझे कल बाहर जाना है। मैंने सर हिला दिया और वो दोनों निकल गए। वापस आकर देखा तो अरुणिमा थकान की वजह से सो चुकी थी। मैंने नम कपड़े से उसकी चूत और गांड को हल्के से पौंछा और अरुणिमा को चादर ओढ़ा दिया। 

मैं खुद भी उसकी बगल में लेट गया और नींद लग गई। सुबह नौ बजे मोबाइल के रिंग से नींद खुली। दूसरी तरफ शमशुद्दीन जी थे। फोन उठाते ही वो चिल्लाए- अबे भड़वे! हमारे जाने के बाद भी उस वेश्या को चोद रहा था क्या … जो अब तक सो रहा है?

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दुबारा चुदाई के लिए ले आया दो लोग

जल्दी उठ और निगम जाकर चारों फाइल जमा कर दे और पावती ले लेना। वो मेरे पीए को दे देना। मैं फटाफट उठा और फ्रेश होकर तैयार होने लगा। अरुणिमा भी उठ गई। 

जब तक मैं तैयार हो रहा था और फाइलों को समेट और एक सी जमा रहा था, तब तक उसने नहा कर नाश्ता तैयार कर दिया। मैं जैसे ही नाश्ता करने बैठा, वो डाइनिंग टेबल के नीचे घुस गई। 

उसने मेरी पैंट की ज़िप खोली और मेरा लंड बाहर निकाल लिया। मैंने पूछा- क्या कर रही हो? उसने मुस्कुरा कर कहा- आप इतने दिन से मुझे चोद नहीं पा रहे हो। कल का भी प्रोग्राम आपका व्यर्थ चला गया था और आज भी आपको काम है। 

इसलिए मैंने सोची कि आपको कम से कम थोड़ी राहत तो दे ही दूँ। इतना बोल कर वो हंस दी और उसने मेरा लंड अपने मुँह में भर कर चूसना चालू कर दिया। एक तो उसका लंड चूसने का टेलेंट और इतने दिनों की मेरी बेताबी, सो पांच मिनट भी नहीं लगा और मैं उसके मुँह में झड़ गया। 

उसने चूस कर और चाट कर मेरा लंड साफ़ कर दिया। फिर मैंने नाश्ता किया। नाश्ता करके और फाइल को समेट कर मैं दरवाजे तक आया। अरुणिमा भी मेरे पीछे पीछे दरवाजे तक आई। 

मैंने दरवाजा खोल कर उसके होंठों को चूमा और बाहर निकलने ही वाला था कि मुझे धक्का देकर कोई अन्दर घुस गया। पलट कर मैंने देखा तो गुरबचन जी दो लोगों के साथ मेरे सामने खड़े थे। 

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