पड़ोस की चालाक दीदी की चुदाई -1

रूपा दीदी मेरी बहन नहीं थी पर वह मुझसे उम्र में बड़ी थी इसलिये मैं उन्हें दीदी कहता था। वह हमारे पड़ोसी की बेटी थी। हमारे घर एक दूसरे से सटकर थे। हमारे घर के बगल में रूपा का घर था, उसके बगल में साक्षी का घर था। 

साक्षी और रूपा दीदी एक ही क्लास में पढ़ती थी इसलिये उनमें काफी गहरी दोस्ती थी। वे दोनों देर रात तक छत वाले कमरे में पढ़ाई करती थी। कभी-कभी देर रात तक पढ़ाई करती हुई वह दोनों वहीं सो जाती थी। ह

म तीनों के छत पर कमरे बने हुये थे, मैं अपने छत वाले कमरे में ही रहना पसंद करता था। वहाँ से मैं उन दोनों को रोज हँसते खिलखिलाते देखता था। दोनों ही लड़कियों के कोई बॉयफ्रेंडस् नहीं थे। 

मैंने या मुहल्ले वालों ने कभी उन्हें किसी लड़के से नजरें मिलाते नहीं देखा था। दिखने में दोनों ही खूबसूरत थी। रंग रूप, कद काठी, बाल, वेषभूषा, वस्त्रभूषा इनमें काफी समानतायें थी। मैं साक्षी को खिलखिलाते देख उस पर मरने लगा था।

मेरे मन में उसे पाने की इच्छा होने लगी इसलिये वे दोनों जब भी छत पर आती, मैं अपने कमरे से बाहर आकर उनसे इधर उधर की बातें करता था। साक्षी भी रूपा की ही तरह मुझसे उम्र में बड़ी थी पर उसे देखते ही मेरा मन डावांडोल होने लगता था। 

रूपा से मेरी अच्छी बनती थी इसलिये मैंने सोचा मैं रूपा को अपने मन की बात बता दूँ। मौका देख के एक दिन मैंने रूपा से अपने मन की बात कह दी। “पागल तो नहीं हो गये हो? वह उम्र में तुमसे बड़ी हैं।” रूपा बोली। 

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रूपा से पूछा लड़को के बारे में 

“आजकल यह सब चलता है।” मैं बोला। “उसे नहीं चलेगा!” वह बोली। “तुम पूछ कर तो देखो।” मैं बोला। “अरे! मुझे पता हैं, वह नहीं मानेगी।” रूपा बोली। “पूछने में क्या जाता है?” मैंने जिद की। “उसे लड़के पसंद नहीं!” रूपा धीमे स्वर में बोली। 

“क्या?” मैंने चौंककर पूछा। “यह सच है।” वह बोली। “अच्छा! इसीलिये वह किसी लड़के से मेलजोल नहीं रखती?” मैं बोला। “हम्म!” गर्दन हिलाते हुये रूपा ने हामी भरी। “क्या तुम्हें भी लड़के पसंद नहीं? 

मैंने तुम्हें भी कभी किसी लड़के से इश्क लड़ाते नहीं देखा।” मैंने रूपा से पूछा। “धत! लड़कियों से कोई ऐसे सवाल करता हैं क्या?” वह शर्माकर बोली। “इसमें शर्माने वाली क्या बात है? प्यार है तो है।” मैं बोला। 

“तुम्हारे प्यार की नैया तो तैरने से पहले ही डूब गई!” रूपा मुझे चिढ़ाते हुये बोली। “मैं तो कहता हूँ कि तुम एक बार उससे पूछ ही लो। क्या पता डूबी हुई नैया फिर से तैरने लगे।” मैं फिर उसी ढर्रे पर आ गया। 

“तुमने तो जिद ही पकड़ ली है उसे पूछने की … वह लड़कों से नफरत करती है, वह बिल्कुल भी नहीं चाहेगी कि तुम्हारा उससे कोई रिश्ता बने।” रूपा अपनी बात पर अटल रही। फिर कुछ दिन ऐसे ही निकल गये। 

एक रात मेरी नींद खुली तो मैं छत पर टहलने के लिये कमरे से बाहर आया। बगल की छत पर रूपा के कमरे की लाईट जल रही थी। मैंने सोचा रूपा और साक्षी पढ़ाई कर रही होंगी। तो मैंने सोचा उनके कमरे में जाकर एक बार साक्षी को देख लूं, फिर उसके सपने संजोता हुआ सो जाऊं। 

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दोनों लड़कीओ को देखा नंगा 

मैं उनका दरवाजा खटखटाने ही वाला था कि अंदर से ‘आउच’ की ध्वनि सुनाई पड़ी। मैं रुक गया। कुछ पल बाद दोनों के खिलखिलाने की आवाज आई। अब मेरी उत्तेजना जाग उठी, मैंने दरवाजे की सुराख में से अंदर झाँका तो देखा कि रूपा साक्षी के निप्पल को दांतों से काट रही थी। 

दोनों ही निर्वस्त्र होकर आमने सामने खड़ी थी। कभी साक्षी रूपा के निप्पल चूस रही थी, कभी रूपा साक्षी के। मैं उनका यह रंगीन खेल देख कर उत्तेजित हो उठा और अनायास ही मेरा धक्का दरवाजे को लग गया। 

दरवाजे की आवाज से दोनों सजग हो गयी। मैं जल्दी से हटकर दीवार से सटे ड्रम के पीछे छुप गया। कुछ देर बाद दरवाजा खुलने की आवाज हुई और कपड़े पहनी हुई रूपा बाहर आकर इधर उधर देखने लगी। 

वह यहाँ वहाँ घूमी फिर ड्रम के सामने आकर खड़ी हो गयी जहाँ मैं छुपा था। मैंने अपने होठों पर उंगली रख कर उसे चुप रहने का इशारा किया। तभी अंदर से साक्षी की आवाज आयी- क्या हुआ? कौन है? “पड़ोस का बिल्ला!” मेरी तरफ देखती हुई रूपा बोली। 

“मार भगा साले को, सारा मूड खराब कर दिया।” साक्षी अंदर से बोली। मैंने रूपा को हाथ के इशारे से अंदर जाने को कहा तो उसने भी हाथ का इशारा कर के मुझे निकल जाने को कहा। 

“पहले तुम जाके दरवाजा बंद करो फिर मैं चला जाता हूँ।” ऐसा मैंने उसको इशारे से समझा दिया। मेरे इशारे को समझकर वह कमरे में चली गयी और दरवाजा बंद कर लिया। मैं भी दबे पाँव वहाँ से निकल लिया। दूसरे दिन सुबह सबेरे ही रूपा मेरे कमरे में आ गयी।

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