पड़ोस की चालाक दीदी की चुदाई – 3

“अब इस कमरे में इस बेड पर तुम दोनों ही हो। मैं कमरे से बाहर जाकर, बाहर से दरवाजा बंद कर दूंगी। सिर्फ एक घंटा हैं तुम दोनों के पास … मैं अब चलती हूँ।” कहकर वह बाहर चली गयी। 

दरवाजा बंद होने की आवाज हुई। “मुझे तो यकीन ही नहीं हो रहा हैं हम दोनों …” मेरे मुँह से साक्षी के लिये बोल निकले ही थे कि पीछे से रूपा की आवाज आयी- शर्त टूट गयी, प्लान कॅन्सल … चलो निकलो बाहर! “अरे! गलती से बोला। अब एकदम चुप रहूँगा।” 

मैं माँफी माँगते हुये बोला। “मुझे पता था तुम गलती करोगे इसलिये मैं रुकी थी। अब मैं सच में जा रही हूँ। दुबारा गलती मत करना। साक्षी! इसने दुबारा रूल तोड़ा तो इसे लात मार के भगा देना।” 

रूपा बोली। थोड़ी देर बाद दरवाजा बंद होने की आवाज आयी। कमरे में कुछ देर खामोशी छाई रही। मैं अगल बगल में हाथ फेरकर साक्षी को टटोलने की कोशिश करने लगा। काफी देर प्रयास करने के बाद बेड पर मेरे हाथ का स्पर्श साक्षी के हाथ को हुआ। 

“अरे! यह क्या?” कल रात को जब साक्षी को मैंने देखा था तो उसके हाथ के नाखून कटे हुये थे, आज एक रात में इतने कैसे बढ़ गये? यह तो बिल्कुल रूपा की तरह हैं, थोड़े गोलाकार। 

आज सुबह ही तो मैंने रूपा की उंगली पकड़ी थी, अभी अभी तो इसी हाथ ने मेरा हाथ पकड़कर मुझे कमरे तक लाया था। वहीं टच, वहीं फिलिंग।” “वाह रूपा वाह! क्या चाल चली हो? मैंने तुम्हारी सहेली की माँग की और तुमने अपने आप को मेरे सामने परोस दिया? 

दूध वाले के साथ चुदाई का किस्सा – 1 

रूपा की चाल आ गई समझ

मुझे शक ना हो इसलिये आँखे बांध दी। मुँह से शब्द निकलेंगे तो पता चल जायेगा कि मेरे साथ साक्षी नहीं रूपा सेक्स कर रही है इसलिये कुछ भी बोलने से मना किया।” स्पर्श से रूपा को पहचान कर मैं मन ही मन बोला। 

देखा जाये तो मुझे सेक्स से मतलब था, साक्षी करे या रूपा इस बात से क्या फर्क पड़ने वाला था। हम लोग जिस पड़ाव तक पहुँच गये थे, उस पड़ाव से पीछे हटना बेवकूफी थी। मैंने रूपा का हाथ अपने दोनों हाथों में लिया और उसे बड़े प्यार से चूम लिया। 

बंद आँखों से भी पता चला कि मेरे हाथ चूमने से वह सिसकार उठी थी। मैंने धीरे धीरे उसके बदन पे हाथ फेरना शुरू किया। मेरे हाथों का स्पर्श अपने बदन पर पाकर वह झनझना उठी और मुझसे लिपट गयी। 

उसके साँसों की गर्मी मेरे कानों पर महसूस हो रही थी। मैंने अपने दोनों हाथों से उसका चेहरा पकड़ा और उसके ओठों को चूम लिया। मेरे चूमने से मानो उसके बदन में बिजली कौंध गयी, वह मेरे बालों को पकड़कर मुझे जोर जोर से चूमने लगी। 

जब तक वह मुझे चूमती रही, तब तक मैं उसके बूब्स कपड़ों के ऊपर से ही दबाता रहा। थोड़ी देर बाद मैंने उसके टॉप में हाथ डालना चाहा तो वह पीछे हट गयी। कुछ देर बाद उसने टटोलकर मेरा हाथ पकड़ा और अपने खुले हुये बूब्स पर रखा। 

नर्म नर्म गोल मटोल चूचियों का स्पर्श पाकर मैं दीवाना हो गया। एक हाथ से उसकी एक चूची को मसलता हुआ मैं दूसरी चूची को चूस रहा था। वह मेरे बालों को और गर्दन को मस्त होकर सहला रही थी। 

थोड़ी देर उसकी चूचियों को चूसने और मसलने के बाद मैं थोड़ा पीछे हटा, अपने सारे कपड़े उतार दिये और उसका हाथ पकड़कर अपने लंड पे रख दिया। वह मेरे लंड को अपनी मुट्ठी में पकड़कर उसे हिलाने लगी। 

मैं उसकी जाँघों पर और कमर पर हाथ फेरता रहा। थोड़ी देर बाद वह लंड छोड़कर पीछे हटी। उसने अपने सारे कपड़े उतार दिये और नंगी होकर मुझसे फिर लिपट गयी। मैं उसकी चूत को सहलाते हुये उसे चूमने लगा। 

सेक्स की एक लम्बी कहानी और वासना – 1

साक्षी बनकर चुदती थी मेरी दोस्त 

वह भी मेरा लंड हिलाते हुये मुझे चूम रही थी। जब ऐसा लगा कि हम अब पूरे तैयार हैं वह मेरे गले में हाथ डालकर पीठ के बल बेड पर लेट गयी। उसके हाथ के खिंचाव से मैं उसके ऊपर आ गया। 

उसे चूमता हुआ मैं अपने लंड को उसकी चूत की दरार पर रगड़ता रहा। कुछ ही देर में उसने मेरा लंड पकड़ा और सुपारा चूत की फांक में धँसा दिया। यह उसका न्यौता था चूत चुदाई का! मैं उसकी चूत में अपना लंड डालकर उसे चोदने लगा। 

जैसे जैसे धक्के लगते, उसके नाखून मेरी पीठ में धँसते जाते। साक्षी के नाखून नहीं थे, उससे मेरी पीठ बच जाती। पर रूपा के नाखून मेरी पीठ पर अपनी जवानी के निशान बना रहे थे। मैं मस्त होकर कमर चलाता रहा। 

बोलना तो कुछ था नहीं … इसलिये कमरे में सिर्फ सिसकारियाँ गूँज रही थी। हमारी सिसकारियां तब तक गूँजती रही जब तक हम झड़कर खामोश ना हुये। जब दोनों ही झड़ गये दोनों ने एक दूसरे को कसकर जकड़ लिया। 

कुछ देर हम एक दूसरे से लिपटे रहे। थोड़ी देर बाद मेरे कंधे पर रूपा की थपकी पड़ी और उसने मुझे ऊपर धकेला। यह उसका खामोश इशारा था कि खेल खत्म हुआ … अब उठ जाओ। मैं उठकर बेड पर बैठ गया। 

रूपा ने शायद आँखो की पट्टी खोल दी थी और वह कमरे से बाहर चली गयी थी। कुछ देर की खामोशी के बाद दरवाजे पर दस्तक हुई और रूपा की आवाज आयी- हुआ क्या? मैं दरवाजा खोलूं क्या? “अभी नहीं, अभी मैंने कपड़े नहीं पहने हैं।” 

उसकी चालाकी पर हँसता हुआ मैं बोला। “जल्दी करो, मुझे सोना है।” वह बाहर से ही बोली। मैंने कपड़े पहन लिये। वह अंदर आयी और और मेरा हाथ पकड़कर मुझे मेरे रूम में ले गयी। 

वहाँ जाकर उसने मेरे आँखों की पट्टी खोली। मैं आँखें खोलकर उसकी तरफ देखा और मुस्कुराया। “मजा आया?” उसने मुस्कुराकर पूछा। “जितना सोचा था उससे भी ज्यादा आया!” कहते हुये मैं उससे लिपट गया। 

“अरे! अरे! यह साक्षी नहीं, मैं हूँ।” वह मेरी पीठ थपथपाते हुये बोली। “आय नो!” कहते हुये मैंने उसके गाल को चूमा। वह सरसरायी और मुझे जोर से कस लिया। “क्या यह दुबारा हो सकता है?” मैंने पूछा। “उससे पूछना पड़ेगा।” 

वह अभी भी चालाकी दिखा रही थी। “ठीक है, उससे पूछो।” मैंने भी चालाखी में बोला। “अभी मुझे जाना चाहिये!” मेरे आलिंगन से निकलती हुई वह बोली और चली गयी। फिर तो वह रोज ही झूठ मूठ साक्षी को पूछने का नाटक करती रही और रोज ही मुझसे साक्षी बनकर चुदती रही।

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