पड़ोसन वाली लड़की को खूब चोदा – 1

अभी करीब 4 साल से बाहर रह कर मैं पढ़ाई कर रहा हूँ और घर से दूर ही रहता हूँ। इतने साल बाहर रहने की वजह से मेरा ध्यान कभी अपने गांव की लड़कियों पर नहीं गया।

यह देसी लड़की की चूत कहानी तब की है, जब मैं बहुत समय बाद लंबे समय के लिए मेरे गांव आया था। मेरे घर के बिल्कुल सामने ही एक दीदी रहती है, यह उसकी चुदाई की कहानी है। उसका नाम कविता था।

मैंने पहले कभी इतना अच्छे से नोटिस नहीं किया था और कभी उसके बारे में कुछ उल्टा सीधा नहीं सोचा था। आगे बढ़ने से पहले मैं आपको कविता दीदी के बारे में कुछ बता देता हूँ। कविता एक काफ़ी सुंदर लड़की है।

वह मुझसे 4 साल बड़ी है, जिस वजह से मैं उसे दीदी कहता हूँ। उसका फिगर काफ़ी मस्त है। वह भी मेरी तरह कुंवारी थी। एक दिन मैं अपने घर के आंगन में खड़ा था, तभी मुझे सामने के घर से कपड़े धोने की आवाज़ आई।

मैंने देखा तो कविता ही कपड़े धो रही थी। मेरे घर से उसका घर साफ दिखता है। कपड़े धोने की वजह से वह थोड़ी गीली हो गई थी। उसके कपड़े धोते समय ऊपर नीचे होते मुझे उसके चूचों की गली का दर्शन हो रहा था।

हाथ से कपड़े धोने की वजह से उसके बूब्स भी काफ़ी हिल रहे थे और उसके कपड़े गीले होने की वजह से उसके बूब्स सही आकार में दिख रहे थे। यह सब देख कर मैं एकदम से उत्तेजित हो गया और उसे देखते हुए मदहोश होने लगा था।

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अकेले भी समय बिताने लगी पड़ोसन

मेरे छोटू उस्ताद भी टनटना गए थे, मानो अभी पैंट से बाहर आ जाएंगे। उसी समय मुझे कॉल आ गया और मैं एक साइड में चला गया। थोड़ी देर बाद वो भी कपड़े लेकर छत पर चली गयी। मैं भी अपनी छत पर आ गया।

गीली होने की वजह से मुझे उसका सारा फिगर अच्छे से दिख रहा था। मुझे तब पहली बार उसे चोदने की इच्छा हुई। उसने मुझे देख लिया और आवाज़ दी। हम दोनों ने थोड़ी बातचीत की और नीचे आ गए।

फिर मैं कई बार उसके घर उसे देखने के लिए जाने लगा, कभी सब्जी लेने या कभी देने। कुछ दिनों में हमारी बातचीत बहुत बढ़ गयी। हम दोनों दोस्त ही बन गए थे। अब कभी कभी तो हम दोनों एक अकेले कमरे में बैठ कर बातें कर लेते थे।

हमारे बीच बातें साफ़ होने लगी थीं और जवानी की तपिश हम दोनों को ही जलाने लगी थी। वो मुझे पसंद करने लगी थी और मैं तो उसकी जवानी का रस चूसने के लिए व्याकुल था ही।

मैं मस्ती करते करते कभी उसके बूब्स को हाथ लगा देता, तो कभी उसके ऊपर लेट जाता, तो कभी उसके बूब्स ही दबा देता। पर वह मजाक में या जानबूझ कर सब नजरअंदाज कर देती थी।

एक बार जब मैं सुबह मेरी मम्मी के कहने पर कविता के घर सब्जी देने गया तो मैं कविता से मिलने उसके कमरे में चला गया। मैंने बिना नॉक किए ही दरवाजा खोल दिया। उस समय वह नंगी थी और कपड़े पहन रही थी। फिर भी उसने मुझसे कुछ नहीं कहा।

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समीज बंद करने का नहीं किआ मन 

मैं सीधा उसके बेड पर लेट गया। वो कपड़े पहनने के बाद अपने बाल संवार रही थी। उसने उस समय बस ऊपर कमीज़ ही पहनी थी, जिससे उसके बूब्स के बीच की लाइन काफ़ी अन्दर तक दिख रही थी।

उसकी कमीज़ उसके घुटनों के थोड़ा ऊपर तक ही थी और उसने नीचे कुछ भी नहीं पहना था। मैं भी टी-शर्ट और शॉर्ट में ही था। उसने मुझे उसे घूरते हुए देखा पर कुछ नहीं कहा। फिर उसकी मम्मी ने आवाज़ दी कि वे बाहर जा रही हैं।

कविता ने मुझे बताया कि मम्मी शाम को वापस आएंगी और अब घर में तुम्हारे अलावा कोई नहीं है। मैं खुद भी ऐसे किसी मौके की तलाश में था। आज मुझे कैसे भी उसे चोदना ही था। मेरा मन उसकी चुदाई के लिए बेचैन हो रहा था।

उसने मुझे अपने पास बुलाया और समीज़ के बंद बांधने को कहा। वह मेरी तरफ़ पीठ करके एक छोटे से स्टूल पर बैठ गयी। मैं उसके करीब आ गया और उसके बालों को आगे कर दिया, जिससे उसकी गोरी पीठ दिखने लगी।

मेरी नज़र नीचे गयी तो मैंने देखा कि उसके पेट का वो हिस्सा जो कमर के नीचे होता है, मुझे दिखने लगा। चूंकि उसने नीचे कुछ नहीं पहना था, तो झलक दिखाई देने लगी थी। मैं उसे और ज्यादा देखने के लिए अपने दोनों हाथ उसकी पीठ पर रख दिए।

उसके गोरे चिकने बदन को छूते ही मानो मेरे अन्दर आग सी लग गई और मैं मदहोश हो गया। मेरा लंड भी तन गया। मैंने हाथ से पीठ को सहलाया। उसने भी कुछ नहीं बोला। मैं अपने हाथ को धीरे धीरे चलाने लगा। वो भी मस्त होने लगी।